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मां ममता की प्रतिमूर्ति एवं समता की प्रतिकृति

तमिलनाडु चेन्नई :

कोरुक्कुपेट स्थित ओसवाल गार्डन में विराजित जय धुरंधर मुनि ने विश्व मातृत्व दिवस पर विशेष उद्बोधन में कहा संसार में हर जीव का का जन्म माता की कुक्षी से ही होता है। भगवान का जब जन्म होता है तो शकेंद्र सर्वप्रथम माता को वंदन करते हैं क्योंकि माँ देव और गुरु तुल्य होती है। माँ से ही परमात्मा का जन्म होता है।

माँ नहीं होती तो भगवान का जन्म कहां से होता। जिंदगी में तीन का आशीर्वाद होना बहुत जरूरी है माँ, महात्मा और परमात्मा। माता ही प्रथम गुरु होती है, जो बच्चे में संस्कारों का बीजारोपण करती है। बालक के जीवन की नींव, माता के आचार, उपचार एवं विचार से होता है।


माँ नौ महीने तक अपने उदर में जीव को धारण कर रखते हुए स्नेह एवं वात्सल्य को प्रति पूर्ण रूप से सुसंस्कार सहित प्रेषित करती है। माँ ममता की प्रतिमूर्ति एवं समता की जीती जागती प्रतिकृति होती है। पुत्र चाहे कितनी दुष्टता कर दे पर मां उसका कभी नहीं चाहती है।


पृथ्वी को भी माता की उपाधि जाती है। क्योंकि किसान चाहे हल्ला कर पृथ्वी का पेट चीर दे या छाती पर फावड़ा चलाएं फिर भी धरती बदले में उसे फसल ही प्रदान करती है। धरती में जितने रस कण है, सागर में कितने जल कण है, ब्रह्मांड में जितने परमाणु कण है, उनकी गणना की जाए तो उससे भी ज्यादा उपकार माता का होता है, जिसका हमेशा गुण स्मरण करना चाहिए।


मुनि ने कहा की मां की करना कोई एहसान नहीं अपितु कर्तव्य होता है। पुत्र के जन्म पर मां-बाप पेडे बांटते है पर यह बड़ी विडंबना है की वही पुत्र आगे जाकर माँ बाप को ही बांट देता है। मां प्रभु की प्रतिमूर्ति है जिसके बिना व्यक्ति कभी सक्सेस नहीं हो सकता। मां का आशीर्वाद मिल जाए तो जीवन सफल हो जाए।

माँ की दुआ पुत्र के लिए सबसे बड़ा वरदान है तो माँ की दुराशीष सबसे बड़ा अभिशाप भी है। यदि पुत्र अपने शरीर की चमड़ी निकाल कर जूते बनाकर भी माता को पहना दे तो भी उसके करो से अॠण नहीं हुआ जा सकता।


जब ऋण स्मरण का भाव रहता है तो स्वत: ही उनके प्रति आदर सत्कार सम्मान विनय एवं सेवा का भाव प्रकट हो जाता है। मुनिवृंद का मंगलवार तक यहीं प्रवचन होगा और बुधवार को विहार करके साहुकारपेट पधारेंगे।

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