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उलझना-सुलझना दोनों व्यक्ति के स्वयं के चिंतन पर निर्भर है : जैन संत डॉ.पदममुनि


नागौर. जयमल जैन पौषधशाला में प्रवचन सुनते श्रावक-श्राविकाएं

जैन संत डॉ.पदममुनि महाराज ने कहा कि व्यक्ति अपने लिए दो प्रकार के वातावरण का निर्माण करता है। एक वातावरण नितांत दुखदायी है। जिसका नाम है विषमता अर्थात उलझन। दूसरा वातावरण है समत्वता अर्थात विचारों में सुलझन। जीव के विचारों में कभी उलझन रहती है तो कभी स्वतः ही सुलझ जाता है। उलझना-सुलझना दोनों व्यक्ति के स्वयं के चिंतन पर निर्भर है। व्यक्ति उलझे हुए विचारों में से उलझन पैदा करता है। सुलझन सुख है तो उलझन दुख है। व्यक्ति चाहता तो सुख है और सदैव सुख के लिए प्रयास करता रहता है किंतु वह विचारों के उलझन में सदैव उलझता रहता है और वह उलझन उसने स्वयं ने पैदा की है।दूसरों को उलझाने के लिए उसने ऐसा वातावरण बनाया और वह खुश होता है। मंच का संचालन संजय पींचा ने किया। चातुर्मास के लाभार्थी सुशीलादेवी, धरमचंद, अभयकुमार, संजयकुमार कांकरिया द्वारा प्रवचन की प्रभावना वितरित की गयीं। दर्शन प्रतिमा के लाभार्थी जयमल जैन महिला मंडल रहें। प्रवचन में पूछे गए तीन प्रश्नों के उत्तर प्रदीप बोहरा, रजनी भूरट, तनीषा जैन ने दिए। अमृता जैन ने 24 उपवास एवं रक्षा ललवानी ने 7 उपवास के प्रत्याख्यान आचार्य मुखारविंद से ग्रहण किए। दिलीप सेठिया ने बताया कि रविवार को सामूहिक एकासना का आयोजन किया जाएगा।


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