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अक्षय तृतीया पर जैन समाज करता है गन्ने के रस का दान

इस बार 7 मई को अक्षय तृतीया है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि इस दिन सर्व सिद्धि मुहूर्त होता है। इस दिन किया गया दान, पुण्य, जप, तप अक्षय रहता है। अक्षय तृतीया का महत्व हिंदू धर्म में ही नहीं, बल्कि जैन धर्म में भी विशेष है। जैन धर्मावलंबी इस दिन मुनियों व साधु संतों को आहार के रूप में गन्ने के रस का दान करते हैं। जैन धर्म में इस प्रथा को पारणा कहा जाता है।

बता दें कि वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया के रूप में मनाया जाता है। देश के हर प्रदेश में इसे किसी न किसी रूप या नाम से मनाया जाता है। जैन धर्म में भी अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है। मान्यता है कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ जिन्हें ऋषभ देव के नाम से भी जाना जाता है, ने 6 माह तक बगैर भोजन पानी के तपस्या की। इसके बाद वे आहार के लिए बाहर बैठ गए। ऋषभ देव को राजा समझ कर लोगों ने सोना चांदी सहित बेटी तक दान दी, लेकिन आहार नहीं दिया। वे बगैर आहार के फिर से तपस्या में चले गए। एक साल 39 दिन बाद जब आदिनाथ पुन: तपस्या से बाहर आए तो राजा श्रेयांश ने उनके मन की बात समझी और उन्हें गन्ने के रस का पान करा कर उनका उपवास तुड़वाया। इस दिन अक्षय तृतीया थी, तभी से जैन समुदाय में अक्षय तृतीया का महत्व है। इस दिन इस जैन समाज के लोग अपना उपवास गन्ना के रस से तोड़ते हैं। मुनियों को भी आहार में गन्ना का रस दान देते हैं।

अक्षय तृतीया के दिन युधिष्ठिर को मिला था अक्षय पात्र

पं. मनोज तिवारी के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन महाभारत के युधिष्ठिर को अक्षय पात्र मिला था। इसकी विशेषता थी कि इसमें भोजन कभी समाप्त नहीं होता था। इसी पात्र से वह अपने राज्य के गरीब व निर्धन को भोजन देकर उनकी सहायता करते थे। इसी आधार पर मान्यता है कि इस दिन किए जाने वाले दान पुण्य का भी कभी क्षय नहीं होता है।

यह भी मान्यताएं: अक्षय तृतीया के दिन भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। पं. तिवारी के अनुसार भविष्य पुराण में उल्लेख है कि इस दिन युगादि तिथियों की गणना होती है।

सतयुग-त्रेतायुग शुरू हुए: सतयुग व त्रेतायुग की शुरुआत इसी दिन से हुई थी। तिथि को लेकर अन्य मान्यताएं भी हैं। महर्षि वेदव्यास ने इसी दिन से महाभारत लिखना शुरू किया था।