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तपाचार्य श्री सन्मति म.सा. ने भगवान महावीर की महिमा का सुनाया प्रसंग


पंजाब  ⁄  लुधियाना


एसएस जैन सभा हैबोवाल के तत्वावधान में श्रमण संघ के प्रथम युवाचार्य गुरुदेव मधुकर मुनि म. के प्रधान शिष्य श्रमण संघीय सलाहकार गुरुदेव श्री विनय मुनि म.सा. भीम के सान्निध्य में प्रवचन सभा रविवार को जारी रही। रविवार को तपाचार्य श्री सन्मति मुनि म.सा. ने भगवान महावीर की महिमा से अवगत करवाया। प्रवचन करते हुए श्री सन्मति मुनि म.सा. ने कहा कि जैन शासन में कहते हैं कि आगम की चर्चा प्रवचन में जब तक नहीं आती, तब तक प्रवचन का कोई महत्व नहीं, क्योंकि आगम एक स्वाध्याय का मार्ग है और स्वाध्याय से ही कर्मो की निर्जरा होगी। एक बार भगवान महावीर विहार करते हुए राजगृही नगरी पधारे और नगरी के बाहर उदयान में रुके। उन्होंने कहा कि हमारे जैन धर्म में कहा जाता है कि 24 तीर्थकर हुए, लेकिन एक से लेकर 23 तीर्थकर का दुख एक तरफ और 24वें तीर्थकर भगवान महावीर का दुख एक तरफ है। कहने के लिए महावीर जैसा बनना बहुत कठिन है। जब तीर्थकर भगवान मां की कोख में आते है, तब उनके पास तीन ज्ञान होते हैं। मती ज्ञान, श्रृति ज्ञान व अवधी ज्ञान। फिर जब वे दीक्षा लेते हैं, तब उन्हें मन पर्याय ज्ञान होता है। वह साधना करके अपने कर्मो को काटकर तीर्थकर भगवान, केवल ज्ञान को प्राप्त करते हैं। इसके बाद देवता समवसरण की रचना करते हैं और भगवान तीर्थकर उसमें प्रवचन देना शुरु करते हैं। महावीर को कर्मो की निर्जरा करने के लिए अनार्य क्षेत्र में विचरण करना पड़ा।