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क्षमाभाव जैन धर्म का मुख्य अंग




तमिलनाडु - कोयंबटूर - सेलम

जैनाचार्य विजय रत्न सूरीश्वर, साधु व साध्वी वृन्द ने रविवार को आदिनाथ जैन संघ सेलम के आदिश्वर भवन में प्रवेश किया। इस अवसर पर आयोजित धर्मसभा में आचार्य ने 'क्रोध आबाद तो जीवन बरबाद विषय पर प्रवचन किए। उन्होंने कहा कि थोड़े रुपए का भी लिया हुआ कर्ज, यदि समय पर चुकाया न जाए तो ब्याज चढ़ते-चढ़ते रकम इतनी बढ़ जाती है जो व्यक्ति को कंगाल कर सकती है। शरीर में लगा छोटा सा घाव यदि नजरअंदाज किया जाए तो धीरे-धीरे बढ़ते हुए अंग वि'छेद की स्थिति आ सकती है। उन्होंने कहा कि पानी, अग्नि और वायु भी यदि प्रमाणातीत हो जाए तो भयंकर विनाश कारी बन सकता है। फिर भी समय जाने पर इनसे होने वाले विनाशकी पूर्ति हो सकती है। कर्ज, घाव, अग्नि,पानी, वायु पर जैसे विश्वास नहीं किया जा सकता है, वैसे ही मन में पैदा हुआ थोड़ा भी क्रोध मात्र एक जन्म नहीं जन्मो जन्म तक विनाश करता है। इसलिए क्रोध पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता। आचार्य ने कहा जैसे शरीर का मुख्य अंग हृदय है , वैसे ही धर्म का मुख्य अंग क्षमाभाव है। यदि जीवन में क्षमाभाव आत्मसात नहीं होगा तो किए हुए सारे धर्म -कर्म भी आत्मा को लाभ नहीं करते ।मानव जीवन में अभिमान ज्यादा होता है। इसलिए उसे हर क्षेत्र में अपनी गलती कभी नहीं दिखती। हर व्यक्ति से गलती हो जाती है। पर उसे स्वीकार कर सुधारने वाला ही आत्म साधना में आगे बढ़ सकता है। प्रवचन से पहले संघ के अध्यक्ष नेमीचंद ने सभी का स्वागत किया। युवक मंडल व बालिका मंडल ने गीत प्रस्तुत किया। सभा में बताया गया कि सोमवार सुबह नौ बजे 'जबान पर लगाम विषय पर प्रवचन होगा।

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