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पश्चाताप के आंसू से आत्मा बनती है निर्मल


तिरुपुर. आचार्य रत्नसेन सूरिश्वर ने कहा कि जब अंतर्मन के सुख-दुखों का वर्णन वाणी से नहीं होता तब सुख-दुख आंसू के जरिए व्यक्त होते हैं।

वे तिरुपुर के सुविधिनाथ जैन संघ के आराधना भवन में रविवार को आयोजित शांतिनाथ भगवान की दीक्षा कल्याणक के तहत आयोजित धर्मसभा में पश्चाताप की महत्ता को बता रहे थे। इस दौरान आचार्य ने पच्चीसी स्तुतियों के माध्यम से पश्चातप की संवेदनाओं को बताया। उन्होंने कहा कि मानव का जीवन-मरण रोने से ही शुरू होता है लेकिन दुख में आंसू बहाना अर्थहीन है। आंसू कर्म का बंधन भी करा सकते हैं और कर्म से मुक्ति भी दिला सकते हैं।

दुख-दर्द वेदना, वियोग में बहाए गए आंसू से मन में अशुभ कर्र्माे का बंध होता है। जो आंसू पश्चाताप के लिए बहाए गए हों वह आत्मा के पापों का नाश कर देते हैं।

आचार्य ने कहा कि गुरु या परमात्मा के पास अपने गुणों का बखान करने नहीं जाना है परंतु पापों को स्वीकार करते हुए पश्चाताप के आंसुओं से पापों का प्रक्षालन करना है। पापों का निवेदन करने के लिए ७०० वर्ष पहले ही रत्नाकर सूरि ने २५ श्लोकों की संस्कृत भाषा में रचना की। जिनके भावों को गुजरात के श्यामजी भाई ने गुजराती भाषा में रत्नाकार पच्चीसी बनाई।

आचार्य ने कहा कि जिस प्रकार एक बालक अपनी माता के समक्ष सहजता से हर बात कह देता है, कुछ नहीं छिपाता उसी प्रकार हमें परमात्मा के सामने बालक बनकर पापाचरण को स्वीकार करना होगा। जीवन तो ऐसा है कि धर्म के कार्य भी सुख पाने के लिए करते हैं। यश-कीर्ति पाने के लिए लाखोंं का दान दिया फिर भी सदाचार का पालन नहीं किया। सदाचार किया तो भी मन में विषय वासना भड़कती रही। आत्मा के अंदर क्रोध की भावना जलती रही। अभिमान रूपी अजगर ने हमें निगल लिया। माया के वश में पापों का आचरण करके ऐसी कमाई की जिससे आत्मा को दुखी करते हैं। परमात्मा से इन त्याग का बल मांगते हुए पूर्व में किए पापों से छुटकारा पाना है। आचार्य ने कहा कि पाप का स्वभाव कपूर जैसा है, कपूर को डिब्बे में बंद रखने पर वह वैसा ही रहता है जबकि उसे खुला रखने पर वह उड़ जाता है। इसी प्रकार पापों को छिपाने पर वह वैसे ही रहते हैं जबकि परमात्मा के समक्ष प्रकट करने पर वह उड़ जाते हैं। चार जून को शरीफ कॉलोनी शंखेश्वर पाश्र्वनाथ जैन मंदिर में सुबह ९.३० बजे शंखेश्वर की भावयात्रा का संगीतमय कार्यक्रम होगा।